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रविवार, 1 मई 2022

वसंत आया - रघुवीर सहाय

जैसे बहन ‘दा’ कहती है 
 ऐसे किसी बँगले के किसी तरु (अशोक?) पर कोई चिड़िया कुऊकी 
 चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर चुरमुराए पाँव तले 
 ऊँचे तरुवर से गिरे 
 बड़े-बड़े पियराए पत्ते 
 कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो— 
 खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई। 
 ऐसे, फुटपाथ पर चलते चलते चलते। 
 कल मैंने जाना कि वसंत आया। 
 और यह कैलेंडर से मालूम था 
 अमुक दिन अमुक बार मदन-महीने की होवेगी पंचमी 
 दफ़्तर में छुट्टी थी—यह था प्रमाण 
 और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था 
 कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल 
 आम बौर आवेंगे 
 रंग-रस-गंध से लदे-फँदे दूर के विदेश के 
 वे नंदन-वन होवेंगे यशस्वी 
 मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व 
 अभ्यास करके दिखावेंगे 
 यही नहीं जाना था कि आज के नगण्य दिन जानूँगा 
 जैसे मैंने जाना, कि वसंत आया।

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