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रविवार, 8 मई 2022

घनानंद- कवित्त और सवैये

3:00 pm 0

 कवित्त 

(1) 

बहुत दिनान के अवधि आस-पास परे,
                                          खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान कौ।
कहि कहि आवन छबीले मनभावन को,
                                          गहि गहि राखत हैं दै दै सनमान कौ।
झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास ह्वै कै,
                                          अब ना घिरत घनआनँद निदान कौ।
अधर लगै हैं आनि करि कै पयान प्रान,
                                          चाहत चलन ये सँदेसौ लै सुजान कौ॥


(2)

आनाकानी आरसी निहारिबो करौगे कौ लौं
                                           कहा मो चकित दसा त्यों न दीठि डोलिहै।
मौन हूँ सों देखिहो कितेक पन पालिहौ जू
                                           कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै।
जान घनआनंद यौं मोहिं तुम्हैं पैज परी
                                           जानियेगो टेक टरें कौन धौं मलोलिहै।
रुई दिये रहौगे कहा लौं बहराइबे की?   
                                           कबहूँ तो मेरियै पुकार कान खोलिहै॥

सवैया 
(1)

तब तौ छबि पीवत जीवत हे, अब सोचन लोचन जात जरे।
हित पोष के तोष सु प्रान पले, बिललात महा दु:ख दोष भरे॥
घनआनंद मीत सुजान बिना सब ही सुख-साज-समाज टरे।
तब हार पहार से लागत हे अब आनि कै बीच पहार परे॥

(2)

पूरन प्रेम को मंत्र महा पन जा मधि सोधि सुधारि है लेख्यौ।
ताही के चारु चरित्र विचित्रनि यौं पचिकै रचि राखि बिसेख्यौ।
ऐसो हियो हितपत्र पबित्र जु आन-कथा न कहूँ अबरेख्यौ।
सो घनआनंद जान अजान लौं टूट कियौ पर बाँचि न देख्यौ॥
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रामचंद्रचंद्रिका - केशवदास

2:37 pm 0

 सरस्वती वंदना 

बानी जगरानी की उदारता बखानी जाइ, ऐसी मति उदित उदार कौन की भई।
देवता प्रसिद्ध सिद्ध ऋषिराज तपवृद्ध, कहि कहि हारे सब कहि न काहू लई।
भावी भूत वर्तमान जगत बखानत है, 'केसोदास' कयों हू ना बखानी काहू पै गई।
पति बर्नै चार मुख पूत बर्नै  पाँच मुख, नाती बर्नै षटमुख तदपि नई नई॥

पंचवटी-वन-वर्णन 

सब जाति फटी दु:ख की दुपटी कपटी न रहै जहँ एक घटी।
निघटी रुचि मीचु घटी हूँ घटी जगजीव जतीन को छूटी तटी।
अघ ओघ की बेरी कटी विकटी निकटी प्रकटी गुरु ज्ञान गटी।
चहुँ ओरन नाचति मुक्ति नटी गुन धूरजटी वन पंचवटी॥

अंगद 

सिंधु तरयो उनको बनरा, तुम पै धनुरेख गई न तरी।
बाँधोई बाँधत सो न बन्यो उन बारिधि बाँधिकै बाट करी॥
श्रीरघुनाथ-प्रताप की बात तुम्हैं दसकंठ न जानि परी।
तेलनि तूलनि पूँछि जरी न जरी, जरी लंक जराई जरी॥

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विद्यापति के पद

2:12 pm 0

                                  (1) 

के पतिआ लए जाएत रे मोरा पिअतम पास।
हिए नहि सहए असह दु:ख रे भेल साओन मास॥
एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए।
सखि अनकर दु:ख दारुन रे जग के पतिआए॥
मोर मन हरि हर लए गेल रे अपनो मन गेल।
गोकुल तेजि मधुपुर बस रे कन अपजस लेल॥
विद्यापति कवि गाओल रे धनि धरु मन आस।
आओत तोर मन भावन रे एहि कातिक मास॥

                                (2)

सखि हे, कि पुछसि अनुभव मोए।
सेह पिरिति अनुराग बखानिअ तिल-तिल नूतन होए॥
जनम अबधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल॥
सेहो मधुर बोल स्रवनहि सूनल स्रुति पथ परस न गेल॥
कत मधु-जामिनि रभस गमाओलि न बूझल कइसन केलि॥
लाख लाख जुग हिअ-हिअ राखल तइओ हिअ जरनि न गेल॥
कत बिदगध जन रस अनुमोदए अनुभव काहु न पेख॥
विद्यापति कह प्रान जुड़ाइते लाखे न मीलल एक॥

                                (3)

कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि,
मूदि रहए दु नयान।
कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि,
कर देइ झाँपइ कान।।
माधब, सुन-सुन बचन हमारा।
तुअ गुन सुंदरि अति भेल दूबरि-
गुनि-गुनि प्रेम तोहारा।।
धरनी धरि धनि कत बेरि बइसइ, पुनि तहि उठइ न पारा।
कातर दिठि करि, चौदिस हेरि हेरि
नयन गरए जल-धारा।।
तोहर बिरह दिन छन-छन तनु छिन-
चौदसि-चाँद-समान।
भनइ विद्यापति सिबसिंह नर-पति
लखिमादेइ-रमान।।
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रविवार, 1 मई 2022

बारहमासा - मलिक मोहम्मद जायसी (पद्मावत - नागमती वियोग खंड)

5:55 pm 0
                                             (1)
अगहन देवस घटा निसि बाढ़ी। दूभर दुख सो जाइ किमि काढ़ी।। 
अब धनि देवस बिरह भा राती। जरै बिरह ज्यों दीपक बाती। 
काँपा हिया जनावा सीऊ। तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ।। 
घर घर चीर रचा सब काहूँ। मोर रूप रंग लै गा नाहू। 
पलटि न बहुरा गा जो बिछोई। अबहूँ फिरै फिरै रंग सोई।। 
सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा। सुलगि सुलगि दगधै भै छारा।। 
यह दुख दगध न जानै कंतू। जोबन जरम करै भसमंतू।। 
     पिय  सौं  कहेहु  सँदेसड़ा  ऐ  भँवरा  ऐ  काग। 
     सो धनि बिरहें जरि मुई तेहिक धुआँ हम लाग।।

                                     (2)
पूस जाड़ थरथर तन काँपा। सुरुज जड़ाइ लंक दिसि तापा।। 
बिरह बाढ़ि भा दारुन सीऊ। कँपि कँपि मरौं लेहि हरि जीऊ।। 
कंत कहाँ हौं लागौं हियरें। पंथ अपार सूझ नहिं नियरें।। 
सौर सुपेती आवै जूड़ी। जानहुँ सेज हिवंचल बूढ़ी।। 
चकई निसि बिछुरै दिन मिला। हौं निसि बासर बिरह कोकिला।। 
रैनि अकेलि साथ नहिं सखी। कैसें जिऔं बिछोही पँखी।। 
बिरह सैचान भँवै तन चाँड़ा। जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा।। 
        रकत  ढरा  माँसू गरा  हाड़  भए सब संख। 
        धनि सारस होइ ररि मुई आइ समेटहु पंख।।

                                    (3)
लागेउ माँह परै अब पाला। बिरहा काल भएउ जड़काला।। 
पहल पहल तन रुई जो झाँपै। हहलि हहलि अधिकौ हिय काँपै।। 
आई सूर होइ तपु रे नाहाँ। तेहि बिनु जाड़ न छूटै माहाँ।। 
एहि मास उपजै रस मूलू। तूं सो भँवर मोर जोबन फूलू।।
नैन चुवहिं जस माँहुट नीरू। तेहि जल अंग लाग सर चीरू॥ 
टूटहिं बुंद परहिं जस ओला।बिरह पवन होइ मारै झोला।।  
केहिक सिंगार को पहिर पटोरा। गियँ नहिं हार रही होइ डोरा।। 
    तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई तन तिनुवर भा डोल। 
    तेहि  पर  बिरह जराइ  कै  चहै  उड़ावा  झोल।।

                                 (4)
फागुन पवन झँकोरै बहा। चौगुन सीउ जाइ किमि सहा।। 
तन जस पियर पात भा मोरा। बिरह न रहे पवन होइ झोरा।। 
तरिवर झरै झरै बन ढाँखा। भइ अनपत्त फूल फर साखा।। 
करिन्ह बनाफति कीन्ह हुलासू। मो कहँ भा जग दून उदासू।। 
फाग करहि सब चाँचरि जोरी। मोहिं जिय लाइ दीन्हि जसि होरी।। 
जौं पै पियहि जरत अस भावा। जरत मरत मोहि रोस न आवा।। 
रातिहु देवस इहै | मन मोरें। लागौं कंत छार जेऊँ तोरें।। 
          यह तन जारौं छार कै कहौं कि पवन उड़ाउ। 
          मकु तेहि मारग होइ परौं कत धरै जहँ पाउ।।
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राघौ! एक बार फिरि आवौ - तुलसीदास (गीतावली)

5:40 pm 0
राघौ! एक बार फिरि आवौ। 
ए बर बाजि बिलोकि आपने बहुरो बनहिं सिधावौ।। 
जे पय प्याइ पोखि कर-पंकज वार वार चुचुकारे। 
क्यों जीवहिं, मेरे राम लाडिले ! ते अब निपट बिसारे।। 
भरत सौगुनी सार करत हैं अति प्रिय जानि तिहारे। 
तदपि दिनहिं दिन होत झावरे मनहुँ कमल हिममारे।। 
सुनहु पथिक! जो राम मिलहिं बन कहियो मातु संदेसो। 
तुलसी मोहिं और सबहिन तें इन्हको बड़ो अंदेसो।।
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जननी निरखति बान धनुहियाँ - तुलसीदास (गीतावली)

5:38 pm 0
जननी निरखति बान धनुहियाँ। 
बार बार उर नैननि लावति प्रभुजू की ललित पनहियाँ।। 
कबहुँ प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सवारे। 
"उठहु तात! बलि मातु बदन पर, अनुज सखा सब द्वारे"।। 
कबहुँ कहति यों "बड़ी बार भइ जाहु भूप पहँ, भैया। 
बंधु बोलि जेंइय जो भावै गई निछावरि मैया" 
कबहुँ समुझि वनगमन राम को रहि चकि चित्रलिखी सी। 
तुलसीदास वह समय कहे तें लागति प्रीति सिखी सी।।
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भरत-राम का प्रेम - तुलसीदास ( रामचरित मानस का अंश)

5:35 pm 0
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढे़ | नीरज नयन नेह जल बाढे़ || 
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा | एहि तें अधिक कहौं मैं कहा || 
मैं जानऊँ निज नाथ सुभाऊ | अपराधिहु पर कोह न काऊ || 
मो पर कृपा सनेहु बिसेखी |  खेलत खुनिस न कबहूँ देखी || 
सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू | कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू || 
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही | हारेंहूँ खेल जितावहिं मोंही || 
     
         महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन | 
         दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन || 

बिधि ना सकेउ सहि मोर दुलारा | नीच बीचु जननी मिस पारा || 
यहउ कहत मोहि आजु न सोभा | अपनी समुझि साधु सुचि को भा || 
मातु मंदि मैं साधु सुचाली | उर अस आनत कोटि कुचाली || 
फरह कि कोदव बालि सुसाली | मुकता प्रसव कि संबुक काली || 
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू | मोर अभाग उदधि अवगाहू || 
बिनु समझें निज अघ परिपाकू | जारिउँ जायँ जननि कहि काकू || 
हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा | एकहि भाँति भलेंहि भल मोरा || 
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू | लागत मोहि नीक परिनामू || 
      
      साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ | 
      प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ ||
 
भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमती जगतु सबु साखी || 
देखी न जाहिं विकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारीं || 
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला || 
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा || 
बिन पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ ऐहि घाए || 
बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू || 
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई || 
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं विषम बिषु तापस तीछी || 

         तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि | 
         तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि ||
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