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रविवार, 1 मई 2022

बारहमासा - मलिक मोहम्मद जायसी (पद्मावत - नागमती वियोग खंड)

                                             (1)
अगहन देवस घटा निसि बाढ़ी। दूभर दुख सो जाइ किमि काढ़ी।। 
अब धनि देवस बिरह भा राती। जरै बिरह ज्यों दीपक बाती। 
काँपा हिया जनावा सीऊ। तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ।। 
घर घर चीर रचा सब काहूँ। मोर रूप रंग लै गा नाहू। 
पलटि न बहुरा गा जो बिछोई। अबहूँ फिरै फिरै रंग सोई।। 
सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा। सुलगि सुलगि दगधै भै छारा।। 
यह दुख दगध न जानै कंतू। जोबन जरम करै भसमंतू।। 
     पिय  सौं  कहेहु  सँदेसड़ा  ऐ  भँवरा  ऐ  काग। 
     सो धनि बिरहें जरि मुई तेहिक धुआँ हम लाग।।

                                     (2)
पूस जाड़ थरथर तन काँपा। सुरुज जड़ाइ लंक दिसि तापा।। 
बिरह बाढ़ि भा दारुन सीऊ। कँपि कँपि मरौं लेहि हरि जीऊ।। 
कंत कहाँ हौं लागौं हियरें। पंथ अपार सूझ नहिं नियरें।। 
सौर सुपेती आवै जूड़ी। जानहुँ सेज हिवंचल बूढ़ी।। 
चकई निसि बिछुरै दिन मिला। हौं निसि बासर बिरह कोकिला।। 
रैनि अकेलि साथ नहिं सखी। कैसें जिऔं बिछोही पँखी।। 
बिरह सैचान भँवै तन चाँड़ा। जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा।। 
        रकत  ढरा  माँसू गरा  हाड़  भए सब संख। 
        धनि सारस होइ ररि मुई आइ समेटहु पंख।।

                                    (3)
लागेउ माँह परै अब पाला। बिरहा काल भएउ जड़काला।। 
पहल पहल तन रुई जो झाँपै। हहलि हहलि अधिकौ हिय काँपै।। 
आई सूर होइ तपु रे नाहाँ। तेहि बिनु जाड़ न छूटै माहाँ।। 
एहि मास उपजै रस मूलू। तूं सो भँवर मोर जोबन फूलू।।
नैन चुवहिं जस माँहुट नीरू। तेहि जल अंग लाग सर चीरू॥ 
टूटहिं बुंद परहिं जस ओला।बिरह पवन होइ मारै झोला।।  
केहिक सिंगार को पहिर पटोरा। गियँ नहिं हार रही होइ डोरा।। 
    तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई तन तिनुवर भा डोल। 
    तेहि  पर  बिरह जराइ  कै  चहै  उड़ावा  झोल।।

                                 (4)
फागुन पवन झँकोरै बहा। चौगुन सीउ जाइ किमि सहा।। 
तन जस पियर पात भा मोरा। बिरह न रहे पवन होइ झोरा।। 
तरिवर झरै झरै बन ढाँखा। भइ अनपत्त फूल फर साखा।। 
करिन्ह बनाफति कीन्ह हुलासू। मो कहँ भा जग दून उदासू।। 
फाग करहि सब चाँचरि जोरी। मोहिं जिय लाइ दीन्हि जसि होरी।। 
जौं पै पियहि जरत अस भावा। जरत मरत मोहि रोस न आवा।। 
रातिहु देवस इहै | मन मोरें। लागौं कंत छार जेऊँ तोरें।। 
          यह तन जारौं छार कै कहौं कि पवन उड़ाउ। 
          मकु तेहि मारग होइ परौं कत धरै जहँ पाउ।।

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